Wednesday, 13 November 2013

कब तक यूँ जज़्बातों से दिल्लगी करते रहोगे
कब तक यूँ मामूली बातों पे फरेब करते रहोगे
हम तो कभी ना कभी संभाल ही लेंगे खुद को
तुम कब तक यूँ ज़िंदगी को फ़ना करते रहोगे
 

Sunday, 27 October 2013

यूँ  अपने आप में ही सिमट कर
शायद उन्हे मायूस कर दिया हमने
थोड़ी चाहत ही तो माँगी थी पर
शायद कोई गुनाह कर दिया हमने
 

Thursday, 24 October 2013

उनके प्यार का इंतज़ार कब तक करें
यह दिल भी कोई कद्रदान चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
वफ़ा करने का क्या सिला मिला हमें
यह दिल भी कभी  मचलना चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
क्यूँ खुशी किसी और की ताबेदार रहे
यह दिल भी अब  आज़ादी चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
हाथ में जाम का  होना ही काफ़ी नही
यह दिल भी नशे में डूबना चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
कब तक जज़्बात दफ़न करें ए खुदा
यह दिल भी तेज  धड़कना चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 

Wednesday, 23 October 2013

हर रोज़ खुदा से ही रंजिश क्यूँ करता है
क़ाहत मुक़द्दर पर अफ़सोस क्यूँ करता है
अपनी तक़दीर  खुद लिखना सीख दोस्त
इन गैरों से बेकार उम्मीद क्यूँ करता है
 
रंजिश = complain ;   क़ाहत = lacking
 
अब नादान समझने की भूल ना करना हमें
आपकी सोहबत ने बहुत कुछ सिखा दिया
 
सोहबत = company
 
ना रखो यूँ उम्मीदें इस नाचीज़ से
हमें खुदा बनने का कोई शौक नही
 

Tuesday, 22 October 2013

कौन कहता है शराब हर गम भुला देती है
हमें तो नशे की तन्हाई बेहद सज़ा देती है