Sunday, 27 October 2013

यूँ  अपने आप में ही सिमट कर
शायद उन्हे मायूस कर दिया हमने
थोड़ी चाहत ही तो माँगी थी पर
शायद कोई गुनाह कर दिया हमने
 

Thursday, 24 October 2013

उनके प्यार का इंतज़ार कब तक करें
यह दिल भी कोई कद्रदान चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
वफ़ा करने का क्या सिला मिला हमें
यह दिल भी कभी  मचलना चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
क्यूँ खुशी किसी और की ताबेदार रहे
यह दिल भी अब  आज़ादी चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
हाथ में जाम का  होना ही काफ़ी नही
यह दिल भी नशे में डूबना चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 
कब तक जज़्बात दफ़न करें ए खुदा
यह दिल भी तेज  धड़कना चाहता है
यह दिल भी ज़िंदगी जीना चाहता है
 

Wednesday, 23 October 2013

हर रोज़ खुदा से ही रंजिश क्यूँ करता है
क़ाहत मुक़द्दर पर अफ़सोस क्यूँ करता है
अपनी तक़दीर  खुद लिखना सीख दोस्त
इन गैरों से बेकार उम्मीद क्यूँ करता है
 
रंजिश = complain ;   क़ाहत = lacking
 
अब नादान समझने की भूल ना करना हमें
आपकी सोहबत ने बहुत कुछ सिखा दिया
 
सोहबत = company
 
ना रखो यूँ उम्मीदें इस नाचीज़ से
हमें खुदा बनने का कोई शौक नही
 

Tuesday, 22 October 2013

कौन कहता है शराब हर गम भुला देती है
हमें तो नशे की तन्हाई बेहद सज़ा देती है
 
अकसर अपने दिल को खुद  ही बहला लेते हैं
काश कभी कोई मनाने की भी कोशिश करता
 
बस एक नज़र में जीत लेते हैं सबको
मेरे यार की अदा भी बड़ी कातिल है
 

Friday, 18 October 2013

खुशी भी उनकी मेहरबानी और गम भी
पता ही ना  चला हम खुद  कहाँ खो गये
 

Thursday, 17 October 2013

मुश्किल है समझना की क्या है बेहतर
जैसे हम थे या जैसा आपने बना दिया
बदले बरताव का क्यूँ करते हो शिकवा
आपकी मेहरबानी ने जीना सीखा दिया
 

Saturday, 12 October 2013

मोहब्बत के दावों से क्या होता है
चाहत तो नज़रों से बयान होती है
 
देर रात का आलम
रोशनी में डूबी सड़कें
चमचमाती हुई गाड़ियाँ
फूल बेचते वो शहज़ादे
 
घर वापस जाते लोग
नशे में झूमती हुई राहें
किसी गरमजोशी  से महरुम
ठंड से सिकुड़ते वो शहज़ादे
 
नींद की सख़्त खुमारी
बोझिल सी होती आँखें
अपनों से मिलने की बैचेनी
जागने को मजबूर वो शहज़ादे
 
नये दिन का इंतज़ार
खुशामदीद को तरसती बाहें
ना कोई उमंग ना कोई सपने
तक़दीर से बेपरवाह वो शहज़ादे