दीदार-ए-यार
का मासूम सा मंज़र
लहलहाती
जुलफें और
झुकी नज़र
वो
खूबसूरत लम्हा याद आता है
मेरा
माशूक़ मुझे याद आता है
हमारा
मिलना और वो जज़्बात
शरमाते
लफ्ज़ और
वो कोशिश
वो
पहला इक़रार
याद आता है
मेरा
माशूक़ मुझे याद आता है
दिनभर
गुफ्तगू की वो इलतिज़ा
नोक-झोक
में से उभरता इश्क़
वो
गुज़रा याराना याद आता है
मेरा
माशूक़ मुझे याद आता है
एक
नया आगाज़ और वो कशिश
हर
ज़र्रे में समाई पाक मोहब्बत
वो
दिलकश किस्सा याद आता है
मेरा
माशूक़ मुझे याद आता है
उनके
दिल में सिर्फ़ हमारा बसेरा
ज़िंदगी
भर साथ निभाने का इरादा
वो
बेशक़ीमती रिश्ता याद आता है
मेरा
माशूक़ मुझे याद आता है
इक़रार = promise ; इलतिज़ा = request ; आगाज़ = beginning
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