जिस
दिलकश खवाब पे मरते थे कभी
आज
वही ख़याल
यूँ उदास सा क्यूँ है
जिस
शक्स पे नबीना ऐतबार था कभी
आज
वही इश्क़
यूँ बेगाना सा क्यूँ है
जिस
ज़िंदगी की तमन्ना की थी कभी
आज
वही समाँ यूँ बेवजह सा क्यूँ है
जिस
घर को हाथों
से सजाया था
कभी
आज
वही आशिया
यूँ
बर्बाद सा क्यूँ है
नाबीना
= blind ;
ऐतबार = trust
; बेगाना
= stranger
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