Tuesday, 8 October 2013

जिस दिलकश खवाब पे मरते थे कभी
आज वही ख़याल यूँ उदास सा क्यूँ है
 
जिस शक्स पे नबीना ऐतबार था कभी
आज वही इश्क़ यूँ बेगाना सा क्यूँ है
 
जिस ज़िंदगी की तमन्ना की थी कभी
आज वही समाँ यूँ बेवजह सा क्यूँ है
 
जिस घर को हाथों से सजाया था कभी
आज वही आशिया यूँ बर्बाद सा क्यूँ है
 
नाबीना  =  blind ;    ऐतबार  =  trust ;    बेगाना  =  stranger
 

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