Saturday, 12 October 2013

देर रात का आलम
रोशनी में डूबी सड़कें
चमचमाती हुई गाड़ियाँ
फूल बेचते वो शहज़ादे
 
घर वापस जाते लोग
नशे में झूमती हुई राहें
किसी गरमजोशी  से महरुम
ठंड से सिकुड़ते वो शहज़ादे
 
नींद की सख़्त खुमारी
बोझिल सी होती आँखें
अपनों से मिलने की बैचेनी
जागने को मजबूर वो शहज़ादे
 
नये दिन का इंतज़ार
खुशामदीद को तरसती बाहें
ना कोई उमंग ना कोई सपने
तक़दीर से बेपरवाह वो शहज़ादे
 

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