Friday, 30 August 2013

क्यूँ शुक्र फरमाते रहे हमेशा की वो मेरे हैं
उन्होने कहाँ हम पर ऐसी इनायत करी थी
 
क्यूँ तरसते रहे यूँ उनका साथ पाने के लिए
उन्हे तो हमारे वजूद की पहचान ही कहाँ थी
 
क्यूँ अपने प्यार का यकीन दिलाते चले गये
उनकी शुरू से इस हक़ीक़त से मुलाक़ात थी
 
क्यूँ परेशान थे की उन्हे हम पर ऐतबार नही
उन्हे बस एक वजह-ए-बेवफ़ाई की तलाश थी
 
हमारी मोहब्बत में वज़न ना सही
कभी उसकी चाहत ही परख ली होती

माना वो ज़ुबान से सब कहता गया
काश हमारी नज़र ही देख ली होती

क्या पाया तुमने यह दिल तोड़ कर
पहले कुछ कोशिश ही कर ली होती

माना मुश्किल था हम पर ऐतबार
उसकी नियत ही आज़मा ली होती
 
कुछ हालात बदल गये, कुछ हम बदल गये
पहले नाखुश होने की कोई वजह होती थी
आज खुश होने की वजह तलाशते हैं

कुछ ज़माना बदल गया, कुछ वो बदल गये
पहले सिर्फ़ उलफत काफ़ी थी जीने के लिए
आज थोड़ी बहुत चाहत तलाशते हैं

क्या शिक़वा करें की कौन कैसे बदल गये
पहले जो खुद पर गुमान किया करते थे
आज अपनी ही पहचान तलाशते हैं

उलफत = love ;    शिक़वा = complaint ;    गुमान = pride

 
कुछ तो रगों में जोश शुरू से ही था
कुछ ज़माने के दस्तूर ने सीखा दिया
काश हमें भी किसी ने रब माना होता
बस इसी कमी ने हमें रक़ीब बना दिया

कुछ तो नशा फ़ितरत में शुरू से ही था
कुछ यारों की सोहबत ने सीखा दिया
काश हमें कोई अपनी आँखों से पिलाता
बस इसी चाह ने हमें शराबी बना दिया

कुछ तो शायराना मिज़ाज शुरू से ही था
कुछ ज़िंदगी की लहरों ने सीखा दिया
काश किसी से हाल-ए-दिल बयान कर पाते
बस इसी ग़ुरबत ने हमें शायर बना दिया
 
रक़ीब = adversary ;   ग़ुरबत = poverty ;  मिज़ाज = attitude